Wednesday 4 November 2009
Tuesday 2 December 2008
शादी के लिए किया गया 209 पुरुषों को अगवा
शायद यह सुनकर आपको यकीन न हो लेकिन यह सच है। ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश में पिछले साल जबर्दस्ती विवाह कराने के लिए 209 पुरुषों को अगवा किया गया। इनम 3 पुरुष ऐसे भी हैं जिनकी उम्र 50 साल से अधिक थी जबकि 2 की उम्र दस साल से भी कम थी। नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी 'भारत में अपराध 2007' रिपोर्ट के अनुसार, मजे की बात है कि बिहार एकमात्र ऐसा राज्य है जहां महिलाओं की तुलना में पुरुषों की अधिक किडनैपिंग होती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में 1268 पुरुषों की किडनैपिंग की गई थी जबकि महिलाओं की संख्या इस आंकड़े से 6 कम थी। अपहरण के 27, 561 मामलों में से 12, 856 मामले विवाह से संबंधित थे। महिलाओं की किडनैपिंग के पीछे सबसे बड़ा कारण विवाह है। महिलाओं के कुल 20,690 मामलों में से 12,655 किडनैपिंग शादी के लिए हुई थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि किडनैप की गईं लड़कियों अधिकाधिक की उम्र 18 से 30 साल के बीच थी।
साभार नवभारत टाइम्स
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Monday 1 December 2008
नेता जाग गये या फिर हम सो रहे हैं
मुंबई में हुए आतंकी हमले अब समाप्त हो गये हैं. उन्हें जो करना था वो कर गये और हमेशा की तरह बाद में छोड गये हमारे उन नेताओं को राजनीति करने के लिए जिसका एक भी मौका हमारे नेता चूकना गंवारा नहीं समझते. अभी मुठभेड पूरी तरह से समाप्त ही नहीं हुआ था कि हमारे नेता बयानबाजी करना शुरू कर दिये. मोदी कहते हैं कि हमने तो पहले ही आगाह किया था कि ऐसा हमला होने वाला है अब केंद्र सरकार नहीं चेती तो यह केंद्र की गद्दी पर बैठे कांग्रेस सरकार की गलती है. वहीं पूर्व सांसद गायकवाड जो कि हमले के दौरान होटल ताज में बंधक थे उन्होंने तो दो दिन तक अंदर में रहकर आगामी लोकसभा चुनाव के लिए स्लोगन तैयार कर लिये हैं और यह बात बडे ही बेबाकी से मीडिया के सामने कह रहे हैं. अब इनका भी जवाब नहीं. खैर हमारे नेता तो इस काम में माहिर ही है. अब महाराष्ट्र के ग़ह मंत्री आरआर पाटिल का बयान सुनिये वह कहते हैं कि बडे-बडे शहरों में ऐसी घटनाएं होती ही रहती है फिर भी हम जीते हैं वे लोग 5000 लोगों को मारने आये थे लेकिन मार पाये मात्र 195 वाह भाई वाह. अब जब जनता ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया पूरे देश में इस घटना के बाद राजनेताओं की थू-थू होने लगी तो हमारे नेताओं ने अंतिम वाण्ा चलाया इस्तीफे का. पहले तो प्रधानमत्री ने किसी के इशारे पर यहां इशारा किसका है यह तो आप जान ही सकते हैं आपात सर्वदलीय बैठक बुलाई जिसमें ग़ह मंत्री शिवराज पाटिल को नहीं बुलाया और उनसे इस्तीफा ले लिया. और हमारे पीसी साहब को ग़ह मंत्री बना दिया अब भला जो दिन भर रूपये और डॉलर में खोये रहते हैं उन्हें कहा से पता चलेगा कि कौन आतंकी कहां से आयेगा. लेकिन यहां पर उन्होंने एक चालाकी जरूर कि इसके लिए अपने मंत्रीमंडल में फिर से कोई नया चेहरा शामिल नहीं किया नहीं तो विरोधियों को फिर एक मौका मिल जाता राजनीति करने का. वहीं आज महाराष्ट्र के ग़हमंत्री और सीएम विलासराव देशमुख को इस्तीफा दिलवा दिया. वाह जी वाह अब बाकी स्थानों की प्रतिक्रिया तो नहीं मालूम पर अपने यहां तो बडी जयकारा हो रही है इस निर्णय की ऐसा पहली बार हुआ कि किसी हमले के बाद किसी सरकार ने इतना कडा कदम उठाया है. सही में हमारी सरकार व नेता जाग गये हैं अब वह ठान लिये कि कुछ न कुछ तो करना ही होगा वगैरह वगैरह. तो मैं ज्यादा पीछे नहीं जाते हुए बस इतना ही कहना चाहूंगा कि पीएम बनने के समय भी सोनिया के विदेशी मूल का मुद्दा उठा था और उन्होंने पीएम का पद त्याग दिया था. उसके बाद मनमोहन सिंह पीएम बने लेकिन सरकार कौन चला रहा है यह तो जगजाहिर है हमारे पीएम साहब कोई निर्णय बिना उनकी अनुमति के तो लेते ही नहीं. अब आप कहेंगे कि मैं कांग्रेस विरोधी हूं शायद इसीलिए ऐसा कह रहा हूं लेकिन इस कार्य के पीछे भी हमारे इन नेताओं की बडी राजनीति छुपी हुई है अब जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होना था वो तो हो ही गये जिनमें बाकी है और आगामी लोकसभा चुनाव में कम से कम अपनी थोडी सी साख बचाने के लिए हमारे सत्तासीन नेता ऐसा कर रहे हैं. कम से कम उस समय यह तो कह पायेंगे कि हमले के बाद हमने जैसा काम किया जिस तरह से कडा निर्णय लिया वैसा आज तक के किसी सरकार ने नहीं लिया था और न ही ले पायेगी. हमने हमेशा जनता की सुरक्षा की सोची है भले ही चाहे विर्दभ में गरीबी के कारण्ा सैंकडों किसान आत्महत्या करें, कुपोषण के कारण हजारों लोग काल के गाल में समा जाये. इस आतंकियों के चपेट में हर महीने दो महीने में सैकडों लोगों की बलि दें. अब फैसला हमें और आपको करना है कि क्या सच में नेता जाग गये हैं या हम फिर सो रहे हैं.
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Saturday 29 November 2008
नहीं बन सके एक-दूजे के लिए
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Thursday 27 November 2008
हमले हो गये यार सोने दो
बुधवार की शाम मैच देख रहा था, मैच खत्म हो गया था मैन ऑफ द मैच का पुरस्कार भी वीरू को मिल चुका था तभी स्पेशल रिपोर्ट के लिए समाचार चैनल लगाया वहां कपिल देव अपनी बात कह ही रहे थे कि अचानक मुंबई से एक बडी खबर आई कि मुंबई में फायरिंग हो रही है. 10 लोग घायल हुए हैं. मैंने भी उसे हल्के से लिया, डाक एडिशन छोड चुका था अब सिटी एडिशन की तैयारी थी, सोचा देख लेते है कुछ लोग मरेंगे तो पहले पेज पर लगाने की सोचूंगा नहीं तो देश-विदेश पेज है न जिंदाबाद. यही सोचते सोचते खाना खाने चला गया. जब खाना खा कर आया तो पता चला कि 25 लोग मारे जा चुके हैं. अब क्या करू यह सोचने लगा क्योंकि आज ऑफिस में मैं ही एकलौता सीनियर आदमी था बाकी सभी छुट्रटी पर चले गये थे और कुछ एक पार्टी में चले गये थे अब कल ही वे आते. और तो और हमारे संपादक जी भी बाहर थे, जिनसे बात नहीं हो पाई. तभी दिमाग में आया कि अपने प्रबंधक को फोन लगाया जाये मैंने उन्हें फोन किया तो उन्होंने कहा कि हां पता है लोग मर रहे हैं. अब तुम जैसा चाहो कर लो देख लेना ठीक-ठाक कवरेज हो जाये. और फोन रख दिया. मैंने फिर उन्हें फोन किया कि सर कोई स्पेशल पेज दिया जाये कि नहीं. तो उन्होंने कहा कि तुम्हें कहा न जैसा तुम चाहो करो साथ ही उन्होंने कहा कि अब ज्यादा टेंशन भी मत लो जब ....... इस स्थान पर उन्होंने कुछ गालियां दी जो लिख नहीं सकता. पीएम, होम मिनिस्टर और वहां के सीएम को कोई फिर्क ही नहीं है तो तू क्यों परेशान हो रहा है. देख लेना और आराम से जाकर सो जा और मुझे भी चैन से सोने दे यार. पहले मुझे लगा कि मैं उनसे मजाक करता हूं शायद उन्होंने मुझे ऐसा जवाब दिया लेकिन रात में दो बजे उनका फोन आया और उन्होंने पुछा कि अभी तक पेज छोडा नहीं अबे जा और जा कर सो यार. फिर अगले सप्ताह तक कहीं न कहीं ऐसा विस्फोट हो ही जायेगा अब कब तक अपनी नींद बेकार करेगा. उनकी इस बात ने मुझे भी झकझोर दिया कि आखिर क्यूं ऐसी घटनाएं बार-बार होती है और अगर हो भी जाती है तो पुलिस क्यों नहीं चेतती है सरकार इसके लिए कुछ क्यों नहीं करती है. यही सब सोच रहा था तभी मेरे एक जूनियर स्टाफ ने मुझसे पूछा कि क्या सोच रहे हैं भैया. तो मैंने उससे सारी बातें कहीं तो उन्होंने कहा कि क्या भैया अगर ऐसा होगा नहीं तो हमें लीड खबरें कैसे मिलेगी. अब अखबार भी तो सजना चाहिए न. और साथ ही वहीं सलाह दी जो मेरे प्रबंधक ने मुझे दी थी. अंततः मैंने भी इसे ही सच मानने में अपनी भलाई समझी पर दिल नहीं मान रहा था और पहले पेज में खबर लगाई तब तक 80 के मरने की पुष्टि हुई थी तो मैंने 100 कर दी कि रात तक तो इतने मर ही जायेंगे. और रूम पर आकर सोने की कोशिश कर रहा हूं कि किसी तरह से नींद आ जाये ताकि सुबह और अखबारों के अपने अखबार की तुलना कर संकू कि हमने कैसा किया है. सही है हमले हो गये तो होने दो जब हमारे देश के नेता सो रहे हैं जो लोगों को हर संभव सुरक्षा का दंभ भरते हैं तो हम क्या करें और कर भी क्या सकते हैं. शायद इसका जवाब में हमें जल्द ही ढूढना होगा नहीं तो किसी दिन यह छापने वाला भी इस देश में कोई नहीं मिलेगा.
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Tuesday 25 November 2008
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ विज्ञापन
यह पढकर आपको लग रहा है कि इसे लिखने वाला शायद पागल हो गया है पंरतु झारखंड में बीते दिनों जिस तरह से एक घटना हुई उससे तो आपको यह पूरा विश्वास हो जायेगा कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया नहीं विज्ञापन है. झारखंड की आठवीं वर्षगांठ पर राज्य सरकार की ओर से 15 नवंबर से 25 नवंबर तक मोरहाबादी मैदान में उधोग मेला लगाया गया था. इसके लिए पूरी तैयारियां भी की कई गई थी. कई बडी कंपनियों के स्टाल भी लगे लोगों की भीड भी काफी उमडी कुल मिलाकर यह मेला पूर्णत सफल रहा. परंतु इस मेले के खत्म होने के बाद भी एक टीस दिल में लगी रही. जब इस मेले की घोषणा के लिए राज्य के उपमुख्यमंत्री सुधीर महतो ने प्रेस कांफ्रेस की थी, जिसमें उन्होंने मेले के बारे मीडिया के माध्यम से जानकारियां दी थी. इसी क्रम में उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि जो इस मेले का बेहतरीन कवरेज करेगा उसे ईनाम दिया जायेगा, वहीं जो खराब या यूं कह लें निगेटिव कवरेज करेगा उसे लाठियां मिलेगी. उन्होंने जब यह बातें कहीं उस समय राज्य के लगभग सभी प्रमुख समाचारपत्र व इलेक्ट्रानिक मीडिया के संवाददाता मौजूद थे. जिसपर सब लोगों ने थोडा ऐतराज जताया था. लेकिन इसका नतीजा कुछ नहीं हुआ. सभी ने उस मेले का कवरेज किया पर किसी ने भी उसके बारे में कोई निगेटिव खबरें छापना तो छोडिये उसके बारे में अगले दिन भी जिक्र नहीं किया. कहते हैं मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होता है. पर इस घटना को देखकर तो यही लगता है कि इस स्तंभ का निर्माण करने वालों ने ही इसे ध्वस्त करने में कोई कसर नहीं छोडी. कहने को तो वे अपने अखबार व टीवी चैनलों के नाम के साथ कई बडे बडे स्लोगन बताते हैं लेकिन सब सिर्फ लोगों को लुभाने के लिए हैं न कि उसपर अमल करने के लिए. हालांकि इसके पीछे के कारणों को देखे तो राज्य सरकार के सूचना व प्रसारण विभाग की ओर से दिये जाने वाले विज्ञापन ने अपना काम कर दिया, अब कोई हर दो दिन में इस मेले का विज्ञापन अखबारों को दे तो किस मीडियाकर्मी की और साथ ही निष्पक्ष खबरों का दंभ भरने वाले वरिष्ट पत्रकार या मालिक की यह मजाल है कि वह इस बात का बुरा माने. तब अगर हम यह कहें कि भाई लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया है तो गलत ही होगा न बल्कि यह कहना शत प्रतशित सही होगा कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया नहीं बल्कि इन्हें मिलने वाला विज्ञापन है.
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